Monday, November 30, 2009

छोटा गाँव - बड़ा दिल


''ग्राम स्वराज'' की लड़त लड़ने वाले चीनू भाई वेध के कामो के कारन राधनपुर के कुछ गावो में घुमने को हुआ। वो गाव हमारे लिए अनजाने थे। राधनपुर से कुच कीमी दूर सबदलपुर नाम के गाव में हमको जाना था। सही में दो पहर बारा बजे हम गाव में पाहोच गए। गाव में जाकर देखा तो गोरी व्रत करके वापस आरही कुछ छोटी लडकिया हमें देख रही थी। मेने उनको पुसा की गाव के मुखिया का घर कहा हे तब उन टोलकी मेसे किसी एक बच्ची ने बोला ''अरे ओ बाबु चलो हम तुमको दीखाते हे'' कुछ दुरी पर जाकर वों बोली बाबु, वो...जो सामने दिखरहा हे ना वही मुखिया का घर हे। उतना बोलकर वो अपनी सहेलीयो के टोले में जाकर घुस गई और सब जोर -जोर से हसने लगे। मेने बाद में अंदाज मारा तो पता चला की वो हमारे पैरवेश को लेकर हस रहे थे। जब उस जगा पर जाकर देखा तो मीटी की दीवारों पे तुटे-फुटे सत के रूप में खड़ा वो मकान था। मकान के बहार के भाग में फिट-फिट कपड़े पहने एक उनचा सा आदमी खड़ा था। उनके पेरो में बहोत बड़े-बड़े जूते थे और कोई कपड़े से उसने अपना सर बाँधरखा था वही तो गाव का मुखिया था। वो हमें देखकर ही समज गया की ऐ लोग कोई सरकारी कमकाज वाले लगते हे। उसने हमारा अच्छा स्वागत किया। उसने चारपाई लगाई और हमको आराम करने को कहा। कुच साधरण बात-चित के बाद वो सही मुदे पर आया। बोलीऐ क्या काम था साब। मेने उनको काम सुनाया जिसमे सिर्फ़ गाव वालो की साइन लेनी थी। तभी वो बीच में बोला ''साब ऐ काम तो सरकारी हे इसलिए हम को डेलीऐ जाना होगा। ऐ 'डेलीऐ शब्द मेरे लिए अपरिचत तो नही था लेकिन कही सुना जरुर था। हम तीनो डेलीऐ की और चल पड़े। वहा देखा तो बड़े-बड़े सरीर के कद वाले भरवाड ज्ञाति के लोग चारपाईओ पे महफ़िल सजाए बेठे थे। मुखियाने उनके साथ हमारी पहेचान करवाई। गाव के फायदे की बात करती हमारी इस लड़ाई को सुनकर वो खुस हुए। फ़िर हमारी और आकर एक हाथ सर पर और दूजा हाथ मिलाकर राम-राम बोलने के उनके रिवाज ने मेरे मन पर बड़ी असर छोड़ दी। फ़िर गाव के सब लोगो को बुलाकर हमारा काम पुरा करवादिया। जब वही से निकलने को सोच रहे थे तभी मुखिया आकर बोला ''साब मेरे घर से खाना खाऐ बिना में आप को जाने नही दुगा'' बहोत ना कहने के बावजूद भी मुखिया अपनी बात पर अडग रहा। हम उनके घर गए और खाना सुरु हुआ। हमारी थाली में पहले रोटला रखा गया फ़िर कढी और घी। कढी में से निकलती महक ने मुजे ज्यदा खाने पर ललचा दिया। खाने का बहोत मजा आया और उससे भी ज्यदा तो वो गरीबो के छोटे घरो में बड़ा दिल दिखने की आई। बादमे मुखिया हमको गाव के चोरे तक छोड ने के लिए आया। थोड़ी ही देरमे गाड़ी आई और हम बेठ गए। गाड़ी हमको शहर की और ले जा रही थी पर मेरा मन तो वो मुखिया के घर में कढी और रोटले को ढूंडता रह गया।

5 comments:

  1. swagat hai. "DREAM" SHIRSHAK SE TO MERA BHI BLOG HAI BHAI.

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  2. Is ganv ke bareme padh achha laga..aise mukhiya aur hon is deshme jo gram sudhar karen yahi kamna karti hun!
    Blog jagatme swagat hai!

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  4. बहुत सही कहा है गाँव में जब कोई अजनबी लोग भी पहुंचते हैं उनको समझ में नहीं आता की इनको क्या खिलाएं क्या पिलायें, और जब यही गाँव वाले शहर आते हैं तो लोग नाक भोह सिकोड़ते हुए दूर से निकलते हैं !!!

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