Monday, November 30, 2009

सवेरा

अभी तो थी रात इधर पर
कब सुबह ने डेरा डाला
सोये थे पेडोपे परिंदे
कब उन्होंने पंख हिलाया
यहाँ वहा बिखरीथी खामोशी
या किशने आकर मेला जमाया
वो पनघट लगताथा शुना
किसने सोते पानी को जगाया
थी अभी किनारे पे वो नाव
कौन जाने किसने उसे चलाया
बजे दूर गाव, मंदिर में घंटी
कुच उसने भी लोगोको याद दिलाया
उस सूरज की पहेली किरण ने
शुबह का मुझे अहसास दीलाया

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