कब सुबह ने डेरा डाला
सोये थे पेडोपे परिंदे
कब उन्होंने पंख हिलाया
यहाँ वहा बिखरीथी खामोशी
या किशने आकर मेला जमाया
वो पनघट लगताथा शुना
किसने सोते पानी को जगाया
थी अभी किनारे पे वो नाव
कौन जाने किसने उसे चलाया
बजे दूर गाव, मंदिर में घंटी
कुच उसने भी लोगोको याद दिलाया
उस सूरज की पहेली किरण ने
शुबह का मुझे अहसास दीलाया
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