Friday, March 18, 2011

''મહુવાથી ગાંધીનગર એક વિરાટ પદયાત્રા''



છેક મહુવાથી ભાઈનું  (મોદીનું ) ભાથું લઈને આવેલા દુધી બેન લોકો સમક્ષ ખુલા મુકેલા ભાથા સાથે નજરે     પડે છે. શ્રીફળ , રોટલો, ડુંગળી જેવી ચીજો સિમેન્ટ થી બનાવીને લાવ્યાતા તેમના સ્વરમાં ..''આતો મારા ભાઈ હાટુ લાવી સુ...  ઈને બિચારાને સિમેન્ટ વિના કંઈ ભાવતું  જ નથ''  




આખી ચળવળના પાયામાં રહેલી વ્યક્તિ એટલે કડવી બેન જેમણે નિરમા પ્લાન્ટ નો સો પ્રથમ વિરોધ નોધવી ને નાનકડા ડોળીયા ગામ થી ગાંધીનગર  સુધીની પદયાત્રાને આકાર આપ્યો ''જાન આપીશું પણ જમીન નહિ'' 
                                                                            

 કાલી ઘેલી ભાષામાં ઓધ્યોગિક નીતિ નો વિરોધ નોધાવા રેલીમાં જોડાએલી ગ્રામીણ બહેનો સાબરમતી આશ્રમમાં નજરે પડી રહી છે   

 બાપુની પવિત્ર ભૂમિ એવા સાબરમતી આશ્રમ માં શાંતિ ભર્યા વાતાવરણ વચ્ચે હળવાશની પળોમાં જણાતી બહેનો જાણે કહેતી ન હોય .....અલી જો ઓલ્યો ફોટો પાળે  રયો. 


બપોરના પડાવ દરમિયાન આશ્રમમાં એવા કેટલાક નાટકો રજુ કરવામાં આવ્યાતા જેમાં ખેડૂતોના જૂસ્સા માં અનેક ગણો વધારો થતો જણાયો .જેમાં રાજનીતિક ,બીઝનેસમેન  અને કાનૂની તજજ્ઞો  દ્વારા ભોળા ભલા ખેડૂતની જમીનનો કેવી રીતે   લુંટી લેવાઈ રહી છે તેના પરના સંવાદ રુંવાટા કંપાવી દે તેવા હતા   

ધોરણ ૧૦ ૧૨ ની પરીક્ષાઓં અર્ધ વચે છોડીને રેલીમાં જોડાએલા વિદ્યાથીઓં ને મન જમીન એક માં સમાન છે .મુલાકાત દરમિયાન તેમણે જણાવ્યું હતું કે બોર્ડની   પરીક્ષા હું આવતા વર્ષે આપી શકીશ પરંતુ આવતા વર્ષે હું સરકાર પાસે મારી જમીન પાછી નહિ માગી શકું  
રેલીમાં છેક થી છેક સુધી ચાલતું આવેલું મોતી નામનું  કૂતરું સહુના આકર્ષણનું કેન્દ્ર બન્યું હતું. લાંબી મુસાફરી બાદ આરામ ફરમાવી રહેલા મોતીને જોઇને કહેવાનું મન થઇ આવે મોદી થી થાકેલો મોતી. 
આરામ બાદ ફરી ગાંધીનગર તરફ કૂચ કરવામાટેની યોજના બતાવતા આગેવાન શ્રી કનુભાઈ કલસારીયા
       
  સંકલન અને તસ્વીર= ભરત દેસાઈ                                                                    

Wednesday, December 22, 2010

राजीव दीक्षित अब नही रहे

एक वक़्त था की इस देश के युवा राजीव दीक्षित को अपना हीरो माना करते थे1 वो जहा भी जाते थे वहा युवाओ से घेरे रहेते थे1 क्युकी युवा राजीव में अपना लीडर देखते थे1 और वो बात में कोई शक नही की उनके भाषण सुनने के लिए लोको के मेले जमते थे1 उन्होंने स्वदेशी अभियान बड़े जोर से चलाया सिर्फ चलाया ही नही अच्छे-खासे लोक जुड़े और उस अभियान को काफी बड़ा रूप मिला1 मुझे याद हे की में ग्यारवी कक्षा में पढता था  तब मेरे ग़ाव में किसी जगा पर मेने उनकी ऑडियो केसेट पहेली बार सुनी और वो केसेट  में राजीवजी की आत्म विश्वास से भरी बाते आज भी याद हे1 सच कहू तो तब से में उनको आदर्श के रूप में देखता आया हु 1बहोत अफ़सोस हे  उनकी देहांत सुन के 1हर एक चीज का वो विरोध करते थे जो चीज विदेश से बनकर आती थी वो जानते थे की विदेशी  प्रोड़क कितनी सहेलाई से इस देश की चीजो को खत्म कर रही हे1 उन्होंने कभी अपने आप को एक आज़ाद राष्ट्र का नागरिक नही माना वो देश को विदेशी कानून और विदेशी कंपनियों का गुलाम आज भी मानते थे1 उसके आलावा भी उन्होंने राजकारण पर भी जमकर प्रहार किये थे उन्होंने कहा था की सदियों पहेले एक मीर जाफर था जिसने इस देश को कितने ही सालो की गुलामी की और धकेल दिया जहा आज तो हर घर में मीर जाफर पैदा हो रहा हे1 जब सच कहे तो उनकी ऐ सची जुबान के कारन वो बहोत बार परेसान भी हुए हे1 जब हर मुसीबत में बंदा बड़ा निर्भय होकर निकला हे जबकि हर मुशीबत को लिपटते वो आगे चेलते रहे1 वो आज इतने आगे चले गए हे की वहासे लोटकर वापिस नही आसकते  ऐ बड़े दुःख की बात तो  हे इ पर उस से भी बड़े दुःख की बात ऐ हे की उनके मोत की नोध किसी एक माध्यम ने भी नही ली1 इस से बड़ा इस देशमें दंभी व्यवस्था का और क्या सबूत हो सकता हे1


    

    

Tuesday, October 12, 2010

मेरा बचपन मत सीनों



पापा मुझे खेलने नहीं देते , मोम हरोज डाटती रहेती हे। स्कूल में अगर होमवर्क न ले गए तो मेडमजी पीटती हे और सबके सामने सरमिन्दाकरती हे। मुझे जूनियर केजी में य सिखाया जाता हे की किस तरा खाया और बोला जाए। मेने तो सुना था की ऐ पापा -मोम सिखाते हे ........पर सच कहू तो वो लोक बहोत बिझी हे, पापा ऑफिस चले जाते हे और मोम घर का काम करके सो जाती हे। अब कुछ ही दिनों में मेरा जन्मदिन आ रहा हे, पापा कहेगे बोलो आपको क्या चाहिए। तो मेने सोच रखा हे॥, में तुरंत कहूँगा की पापा मुझे और कुछ नहीं मेरा ही बचपन चाहिए। आप दोगें न पापा....... ळी -एक बच्चा

Tuesday, September 21, 2010

एक स्वानुभव


बिहार के बोधगया शहरमें एक महीने तक गरीबो की सेवा के लिए जाने को हुआ था। वहा पर भनसाली ट्रस्ट के माध्यम से गरीबी रेखा के नीचे जीते लोगो की आँख के ओपरेशन मुफ्त में किये जाते थे। उन साल १८ हजार लोगो के ओपरेशन हुए थे। उन सबकी रहेने खाने की सुविधा ट्रस्ट के जरिये ही दी जाती थी। तब वहा मेरी डयूट रहेती थी की १०० जितने मरीजों से बने उस वोर्ड में मुझे रात को १२ और सुबह बजे मरीजों की आँखों में दवाई डालनी रहेती थी। और कोई शराबी आकर उने परेशान करे उसका भी ख्याल रखना पड़ता था। वोर्ड के सारे मरीज़ मुझे डोक्टर बाबु कहेते थे क्युकी उन दिनों हमारा पहेरवेश डॉक्टर जेसा ही रहेता था। पर सच कहू तो डॉक्टर का एक भी लक्षण मुज में नहीं था
मुझे याद हे वो मध्यरात्री जब सारे मरीज़ चिरनिंद्रा में सों जाते थे पर मुझे तो तब जागे रहेना था। में अपनी कुरसी से इन सबको देखे रहेता। में देखता उनकी गरीबी को, उनकी दुर्दसा को, और उनिके नशीब को और मन से एक सब्द निकल पड़ता था की कितने अभागी हे बिहारी। बिहार के दूर-दूर के गावो से आते वो लोक थे जो मेरे मन पर बिहार की गरीबी का चित्र ज्यादा स्पष्ट करते थे। उनमे से एक अजीब सी बदबू आती थी जो गरीबी को पहेचान ने के लिए काफी थी। एक पत्रकार की जिनी आँखों को वो बदबू में छुपी मज़बूरी समज में गयी थी। वहा आया हुआ हर मरीज़ गरीब था जिनका आने -जाने का खर्च भी ट्रस्ट ही देता था।
बिहार की गरीबी के बारे में बहोत सुना था लेकिन प्रत्यक्ष तो वाही जाकर ही देखा। खेर ..... एसेही सोचते सोचते रात बीत रही थी तब पीछे से किसीने आवाज दी ''बाबु में यहाँ बे सकता हु'' में ने हा कही। वो बोला बाबु आपको नींद नहीं आती। में ने कहा की में दिन में सो जाता हु। सारे सवाल करने वाला एक अशिक्षित इन्शान था जिन के कपडे बहोत गंदे थे और उनकी आँखे अन्दर की और घुस गई थी पूरी दरिन्द्र्ता से भरी जिन्दगी का साक्षी बनकर वो मेरे सामने खड़ा था। कुछ देर बाद वो बोला की आप बहोत दूर गुजरात से हमारी सेवा के लिए आते हो और बदले में हम आपको कुछ दे भी उनके उन्दिनो सकते। पर बाबु देने के लिए हमारे पास हे भी क्या। पर बाबु आप गुजराती बहोत अच्छे होते हो। और तब भगवान् के रूप में खड़े उस इन्शान के सब्दो से जाने की सुकून मिला।