
बिहार के बोधगया शहरमें एक महीने तक गरीबो की सेवा के लिए जाने को हुआ था। वहा पर भनसाली ट्रस्ट के माध्यम से गरीबी रेखा के नीचे जीते लोगो की आँख के ओपरेशन मुफ्त में किये जाते थे। उन साल १८ हजार लोगो के ओपरेशन हुए थे। उन सबकी रहेने खाने की सुविधा ट्रस्ट के जरिये ही दी जाती थी। तब वहा मेरी डयूट ऐ रहेती थी की १०० जितने मरीजों से बने उस वोर्ड में मुझे रात को १२ और सुबह ५ बजे मरीजों की आँखों में दवाई डालनी रहेती थी। और कोई शराबी आकर उने परेशान न करे उसका भी ख्याल रखना पड़ता था। वोर्ड के सारे मरीज़ मुझे डोक्टर बाबु कहेते थे क्युकी उन दिनों हमारा पहेरवेश डॉक्टर जेसा ही रहेता था। पर सच कहू तो डॉक्टर का एक भी लक्षण मुज में नहीं था
मुझे याद हे वो मध्यरात्री जब सारे मरीज़ चिरनिंद्रा में सों जाते थे पर मुझे तो तब जागे रहेना था। में अपनी कुरसी से इन सबको देखे रहेता। में देखता उनकी गरीबी को, उनकी दुर्दसा को, और उनिके नशीब को और मन से एक सब्द निकल पड़ता था की कितने अभागी हे ऐ बिहारी। बिहार के दूर-दूर के गावो से आते वो लोक थे जो मेरे मन पर बिहार की गरीबी का चित्र ज्यादा स्पष्ट करते थे। उनमे से एक अजीब सी बदबू आती थी जो गरीबी को पहेचान ने के लिए काफी थी। एक पत्रकार की जिनी आँखों को वो बदबू में छुपी मज़बूरी समज में आ गयी थी। वहा आया हुआ हर मरीज़ गरीब था जिनका आने -जाने का खर्च भी ट्रस्ट ही देता था।
बिहार की गरीबी के बारे में बहोत सुना था लेकिन प्रत्यक्ष तो वाही जाकर ही देखा। खेर ..... एसेही सोचते सोचते रात बीत रही थी तब पीछे से किसीने आवाज दी ''बाबु में यहाँ बेठ सकता हु'' में ने हा कही। वो बोला बाबु आपको नींद नहीं आती। में ने कहा की में दिन में सो जाता हु। ऐ सारे सवाल करने वाला एक अशिक्षित इन्शान था जिन के कपडे बहोत गंदे थे और उनकी आँखे अन्दर की और घुस गई थी पूरी दरिन्द्र्ता से भरी जिन्दगी का साक्षी बनकर वो मेरे सामने खड़ा था। कुछ देर बाद वो बोला की आप बहोत दूर गुजरात से हमारी सेवा के लिए आते हो और बदले में हम आपको कुछ दे भी उनके उन्दिनो सकते। पर बाबु देने के लिए हमारे पास हे भी क्या। पर बाबु आप गुजराती बहोत अच्छे होते हो। और तब भगवान् के रूप में खड़े उस इन्शान के सब्दो से जाने की सुकून मिला।
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