Thursday, December 10, 2009

मानव अधिकार आख़िर किस युग में...

आज मानव अधिकार दिन की बात दुनिया भर में हो रही हे। आखिर सोचना तो ऐ हे की एसे कितने लोग हे इस देश में जो अपने अधिकारों के लिए जाग्रत हे। देश में सामान्य नागरिक को भुलाया जा रहा हे जेसे उसका कोई अस्तीत्व ही ना हो। गरीब और कमजोर इन्सान मजाक बनता जा रहा हे। न तो वो कुच बोल सकता हे की न तो वो अपना द्र्स्टीकोण समाज के सामने रख सकता हे। ऐ वो वर्ग हे जिस पर हो सके उतने जुल्म वो लोग करते हे जो अपने आप को आधुनिकता का हिस्सा मानते हे। कही दलित के नाम पर कही कोम के नाम पर तो कही सरकारी दफ्तरों में सामान्य लोग अक्षर भोग बनते रहते हे। जिसे हम कोमन मेन कहते हे उसे हमें प्राधान्य देना पड़ेगा और खुदके अधिकारों के लिए लड़ सके एसा जुनून भी। आज हम जान मुजकर एक एसा पुरूष प्रधान समाज बनाने जा रहे हे की जहा ओरतो को उनके जन्म से पहले ही मार दिया जाता हे। अधिकार देने की बात तो दूर रही पर उनका क्या जिस को जन्म देने से पहले ही उनके अधिकार छीन लिए जाते हे। अपने देश में आज भी कितने ही एसे मजदुर हे जिनको नशा करके सुरंग में काम करने के लिए उतरना पड़ता हे। नमक उत्पादक करने वाले अगरिया लोग जो नमक में काम करने के कारन ज्यादा से ज्यादा बिमारीयों के भोग बनते हे। भारत के कितने ही गावोँ में आज भी दलितों को मंदिरों में नही प्रवेश दिया जाता। तब सवाल होता हे की इस सब जगाओ पर कब मानव अधिकार लागु होगा। मानव अधिकार पर काम करने वाली संस्था का नाम हे ''एमनेस्टी आंतर राष्ट्रीय'' जिन के स्थापक थे पीटर बेनेन्सन। जिन्होंने समग्र मानवों के अधिकारों के बारे सोचा ही नही पर सब अपने अधिकारों को मांग सके इतनी हीमत भी दी। ईन सस्था को १९७७ शांति के लिए नोबेल पारीतोषिक एनायत किया गया। एमनेस्टी सस्था का प्रतीक हे''नौकेले कांटो से चिपकी हुई जलती मुम्बती'' पीटर का एक प्रिय वाक्य था की ''अंधकार को कोशने के बजाय एक दीप जलवों''

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